Warning: include(domaintitles/domaintitle_wiki.exoticindiaart.php3): failed to open stream: No such file or directory in /home/exotic/newexotic/header.php3 on line 761

Warning: include(): Failed opening 'domaintitles/domaintitle_wiki.exoticindiaart.php3' for inclusion (include_path='.:/usr/lib/php:/usr/local/lib/php') in /home/exotic/newexotic/header.php3 on line 761

Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Sign In  |  Sign up
Your Cart (0)
Best Deals
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Hindi > साहित्य > साहित्य का इतिहास > अफ़नासी निकीतीन की भारत यात्रा: Travels of The First Russian Traveller to India
Subscribe to our newsletter and discounts
अफ़नासी निकीतीन की भारत यात्रा: Travels of The First Russian Traveller to India
Pages from the book
अफ़नासी निकीतीन की भारत यात्रा: Travels of The First Russian Traveller to India
Look Inside the Book
Description

पुस्तक के विषय में

प्राचीन काल से ही मध्य एशिया और रूस के बीच सशक्त सांस्कृतिक बंधन रहे हैं । उफनते समुद्रों, खतरनाक रेगिस्तानों और ऊंचे-ऊंचे पर्वतों को पार करते हुए कई बौद्ध भिक्षु व व्यापारी इधर से उधर आते-जाते रहे, लेकिन उनकी रोमांचकारी यात्राओं के बहुत कम विवरण लोगों तक पहुंच पाए हैं ।

वास्को हि गामा से 25 साल पहले भारत की धरती पर कदम रखने वाला पहला यूरोपीय अफ़नासी निकीतीन मूल रूप से रूस का रहने वाला था । वह सन् 1466 से 1475 के बीच लगभग तीन वर्ष तक भारत में रहा । अफ़नासी निकीतीन को पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत की यात्रा कर अपने अनुभवों को लिखने वाला पहला रूसी माना जाता है । उसका जन्म आज के कलीनीन (त्वेर) में हुआ था । यहां पर दो छोटी नदियां महान नदी वोल्गा में मिलती हैं । त्वेर उस समय का संपन्न नगर व व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था । वह लगभग छह साल तक भारत की यात्रा पर रहा और इस दौरान उसने यहां के राज-काज, समाज, संस्कृति, खानपान को करीब से देखा । चूंकि वह कोई तीर्थ- यात्री नहीं था, अत: उसने एक आम आदमी या व्यापारी के तौर पर सभी बातों का आकलन किया है ।

हमें कई नाम अटपटे लगेंगे, कई घटनाएं अविश्वसनीय व भ्रामक लगेंगी, लेकिन यह एक विदेशी का हमारे देश को समझने का नजरिया कहा जा सकता है ।

पंकज चतुर्वेदी नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादकीय विभाग से संबद्ध हैं तथा कई पुस्तकों के लेखक व अनुवादक हैं ।

भूमिका

लंबी दूरी और दुनिया की सबसे ऊंची पर्वतमालाएं रूस और भारत को बहुत दूरी पर ला देती हैं । हालांकि दोनों देशों के संबंध सदैव मधुर व स्वाभाविक मित्र के रहे हैं । अफ़नासी निकीतीन भारत की यात्रा करने वाला पहला रूसी था । त्वेर्त्सा व त्मागा नदियों के वोल्गा से संगम-तट पर स्थित त्वेर नगर (अब कालीनीन) में जन्मे निकीतीन ने किसी से सुना कि भारत में घोड़े नहीं पाले जाते हैं और तभी वहां घोड़े बहुत महंगे बिकते हैं । उसने सोचा कि वह भारत में घोड़े को बेचेगा और उससे मिले बहुत से धन से ऐसी चीजें खरीद लाएगा, जो रूस में महंगी मिलती हैं ।

यह त्वेर शहर के लोगों की फितरत ही कहा जा सकता है कि यहां हर दूसरा आदमी विदेश में व्यापार करने को लालायित रहता था । 15वीं शताब्दी में त्वेर को रूस का व्यापारिक केंद्र माना जाता था । यहां की संपन्नता सड्कों और मकानों पर स्पष्ट दिखती थी । इस विवरण को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि निकीतीन भी व्यापार करने के लिए विदेशों की यात्रा करने वाला उत्साही युवा था । वह जिस तरह से जार्जिया, तुर्की आदि देशों के बारे में लिखता है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह उन देशों से पहले से ही परिचित था ।

कहा जाता है कि शिर्वान रियासत का राजदूत एक दिन मास्को के ग्रैंड ड्यूक इवान तृतीय के दरबार में आया। उसके द्वारा लाए गए तोहफों से ड्यूक बेहद प्रसन्न हुआ और उसने वसीली पापिन को अपना दूत बना कर शिर्वान के दरबार में भेजा । जब यह खबर निकीतीन व कुछ अन्य व्यापारियों ने सुनी तो वे भी शिर्वान के लिए रवाना हो गए । ये लोग दो जलपोत पर सवार थे। इस तरह निकीतीन की महान यात्रा शुरू हुई । निकीतीन की लेखनी से अनुमान लगता है कि उसने वसीली पापिन के साथ सन् 1466 में अपनी यात्रा प्रारंभ की थी । ये लोग वोल्गा नदी के रास्ते अस्त्राखान के शहर पहुंचे । यहां उनके एक जहाज को लुटेरों ने लूट लिया। उनका दूसरा जहाज केस्पियन सागर में तूफान की चपेट में आ कर नष्ट हो गया । अपने जहाज और सारा सामान गंवा देने के बाद भी निकीतीन ने हिम्मत नहीं हारी और वह जैसे-तैसे भारत की ओर बढ़ता गया ।

वास्को डि गामा से 25 साल पहले भारत की धरती पर कदम रखने वाला पहला यूरोपीय अफ़नासी निकीतीन मूल रूप से रूस का रहने वाला था । वह सन् 1466 से 1475 के बीच लगभग तीन वर्ष तक भारत में रहा । निकीतीन रूस से चल कर जार्जिया, अरमेनिया, ईरान के रास्ते मुंबई पहुंचा था । सन् 1475 में वह अफ्रीका होता हुआ वापिस लौटा, लेकिन अपने घर त्वेर पहुंचने से पहले ही उसका निधन हो गया । निकीतीन द्वारा भारत-यात्रा पर तैयार नोट्स को 19वीं सदी में रूस के जाने-माने इतिहासविद् एन.एम. करामजीन ने खोजा था ।

निकीतीन ने भारत में तीन साल बिताए, लेकिन उसकी यात्रा छह साल की रही । उन दिनों समुद्री यात्रा में कितना अधिक समय लगता था, इसकी बानगी कई जगह देखने को मिलती है। पांच सौ से अधिक साल पहले लिखा गया यह यात्रा विवरण इस बात का साक्षी है कि विदेशियों के लिए भारत सदैव से अचंभे, अनबुझी पहेली की तरह रहा है। उसने मूर्ति-पूजा को 'बुतपरस्ती', गणेश व हनुमान को क्रमश: हाथी व वानर के मुंह वाले देवता के रूप में लिखा है।

निकीतीन ने कई खतरे उठाए, कई बार वह लूट लिया गया । उन दिनों समुद्र की यात्रा भी बेहद जोखिम भरी हुआ करती थी । वह पूरे फारस को पार कर के पूर्व के सबसे बड़े बंदरगाह होर्मुज जा पहुंचा। यहां उसने एक घोड़ा खरीदा, ताकि उसे भारत ले जा कर बेचा जा सके । यह हिम्मती व्यापारी एक छोटे से जलपोत में सवार हो कर हिंद महासागर में आ गया और उसका पहला पड़ाव चौल राज्य था। उसने इसी को हिंदुस्तान या भारत माना। निकीतीन ने केवल समुद्र तट से सटे दक्षिणी भारत की ही यात्रा की थी । उसके यात्रा विवरण में विजय नगर साम्राज्य, गुलबर्ग, बीदर, गोलकुंडा जैसे स्थानों का उल्लेख है, जो कि आज भी मशहूर हैं। निकीतीन की अवलोकन-दृष्टि भले ही कहीं-कहीं अतिशयोक्ति से परिपूर्ण लगती हो, लेकिन वह विभिन्न नगरों में मिलने वाले उत्पादों, धार्मिक अनुष्ठानों, जाति प्रथा पर टिप्पणी अवश्य करता है। विभिन्न राजाओं के वैभव, पराक्रम और शानो-शौकत पर भी उसने ढेर सारी जानकारी दी है। कुल मिला कर यह यात्रा-वृतांत मनोरंजक और सूचनाप्रद है।

Sample Page


अफ़नासी निकीतीन की भारत यात्रा: Travels of The First Russian Traveller to India

Item Code:
NZD221
Cover:
Paperback
Edition:
2018
Publisher:
ISBN:
9788123752174
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
28
Other Details:
Weight of the Book: 55 gms
Price:
$5.00   Shipping Free
Look Inside the Book
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
अफ़नासी निकीतीन की भारत यात्रा: Travels of The First Russian Traveller to India

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 4323 times since 17th Aug, 2019

पुस्तक के विषय में

प्राचीन काल से ही मध्य एशिया और रूस के बीच सशक्त सांस्कृतिक बंधन रहे हैं । उफनते समुद्रों, खतरनाक रेगिस्तानों और ऊंचे-ऊंचे पर्वतों को पार करते हुए कई बौद्ध भिक्षु व व्यापारी इधर से उधर आते-जाते रहे, लेकिन उनकी रोमांचकारी यात्राओं के बहुत कम विवरण लोगों तक पहुंच पाए हैं ।

वास्को हि गामा से 25 साल पहले भारत की धरती पर कदम रखने वाला पहला यूरोपीय अफ़नासी निकीतीन मूल रूप से रूस का रहने वाला था । वह सन् 1466 से 1475 के बीच लगभग तीन वर्ष तक भारत में रहा । अफ़नासी निकीतीन को पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत की यात्रा कर अपने अनुभवों को लिखने वाला पहला रूसी माना जाता है । उसका जन्म आज के कलीनीन (त्वेर) में हुआ था । यहां पर दो छोटी नदियां महान नदी वोल्गा में मिलती हैं । त्वेर उस समय का संपन्न नगर व व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था । वह लगभग छह साल तक भारत की यात्रा पर रहा और इस दौरान उसने यहां के राज-काज, समाज, संस्कृति, खानपान को करीब से देखा । चूंकि वह कोई तीर्थ- यात्री नहीं था, अत: उसने एक आम आदमी या व्यापारी के तौर पर सभी बातों का आकलन किया है ।

हमें कई नाम अटपटे लगेंगे, कई घटनाएं अविश्वसनीय व भ्रामक लगेंगी, लेकिन यह एक विदेशी का हमारे देश को समझने का नजरिया कहा जा सकता है ।

पंकज चतुर्वेदी नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादकीय विभाग से संबद्ध हैं तथा कई पुस्तकों के लेखक व अनुवादक हैं ।

भूमिका

लंबी दूरी और दुनिया की सबसे ऊंची पर्वतमालाएं रूस और भारत को बहुत दूरी पर ला देती हैं । हालांकि दोनों देशों के संबंध सदैव मधुर व स्वाभाविक मित्र के रहे हैं । अफ़नासी निकीतीन भारत की यात्रा करने वाला पहला रूसी था । त्वेर्त्सा व त्मागा नदियों के वोल्गा से संगम-तट पर स्थित त्वेर नगर (अब कालीनीन) में जन्मे निकीतीन ने किसी से सुना कि भारत में घोड़े नहीं पाले जाते हैं और तभी वहां घोड़े बहुत महंगे बिकते हैं । उसने सोचा कि वह भारत में घोड़े को बेचेगा और उससे मिले बहुत से धन से ऐसी चीजें खरीद लाएगा, जो रूस में महंगी मिलती हैं ।

यह त्वेर शहर के लोगों की फितरत ही कहा जा सकता है कि यहां हर दूसरा आदमी विदेश में व्यापार करने को लालायित रहता था । 15वीं शताब्दी में त्वेर को रूस का व्यापारिक केंद्र माना जाता था । यहां की संपन्नता सड्कों और मकानों पर स्पष्ट दिखती थी । इस विवरण को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि निकीतीन भी व्यापार करने के लिए विदेशों की यात्रा करने वाला उत्साही युवा था । वह जिस तरह से जार्जिया, तुर्की आदि देशों के बारे में लिखता है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह उन देशों से पहले से ही परिचित था ।

कहा जाता है कि शिर्वान रियासत का राजदूत एक दिन मास्को के ग्रैंड ड्यूक इवान तृतीय के दरबार में आया। उसके द्वारा लाए गए तोहफों से ड्यूक बेहद प्रसन्न हुआ और उसने वसीली पापिन को अपना दूत बना कर शिर्वान के दरबार में भेजा । जब यह खबर निकीतीन व कुछ अन्य व्यापारियों ने सुनी तो वे भी शिर्वान के लिए रवाना हो गए । ये लोग दो जलपोत पर सवार थे। इस तरह निकीतीन की महान यात्रा शुरू हुई । निकीतीन की लेखनी से अनुमान लगता है कि उसने वसीली पापिन के साथ सन् 1466 में अपनी यात्रा प्रारंभ की थी । ये लोग वोल्गा नदी के रास्ते अस्त्राखान के शहर पहुंचे । यहां उनके एक जहाज को लुटेरों ने लूट लिया। उनका दूसरा जहाज केस्पियन सागर में तूफान की चपेट में आ कर नष्ट हो गया । अपने जहाज और सारा सामान गंवा देने के बाद भी निकीतीन ने हिम्मत नहीं हारी और वह जैसे-तैसे भारत की ओर बढ़ता गया ।

वास्को डि गामा से 25 साल पहले भारत की धरती पर कदम रखने वाला पहला यूरोपीय अफ़नासी निकीतीन मूल रूप से रूस का रहने वाला था । वह सन् 1466 से 1475 के बीच लगभग तीन वर्ष तक भारत में रहा । निकीतीन रूस से चल कर जार्जिया, अरमेनिया, ईरान के रास्ते मुंबई पहुंचा था । सन् 1475 में वह अफ्रीका होता हुआ वापिस लौटा, लेकिन अपने घर त्वेर पहुंचने से पहले ही उसका निधन हो गया । निकीतीन द्वारा भारत-यात्रा पर तैयार नोट्स को 19वीं सदी में रूस के जाने-माने इतिहासविद् एन.एम. करामजीन ने खोजा था ।

निकीतीन ने भारत में तीन साल बिताए, लेकिन उसकी यात्रा छह साल की रही । उन दिनों समुद्री यात्रा में कितना अधिक समय लगता था, इसकी बानगी कई जगह देखने को मिलती है। पांच सौ से अधिक साल पहले लिखा गया यह यात्रा विवरण इस बात का साक्षी है कि विदेशियों के लिए भारत सदैव से अचंभे, अनबुझी पहेली की तरह रहा है। उसने मूर्ति-पूजा को 'बुतपरस्ती', गणेश व हनुमान को क्रमश: हाथी व वानर के मुंह वाले देवता के रूप में लिखा है।

निकीतीन ने कई खतरे उठाए, कई बार वह लूट लिया गया । उन दिनों समुद्र की यात्रा भी बेहद जोखिम भरी हुआ करती थी । वह पूरे फारस को पार कर के पूर्व के सबसे बड़े बंदरगाह होर्मुज जा पहुंचा। यहां उसने एक घोड़ा खरीदा, ताकि उसे भारत ले जा कर बेचा जा सके । यह हिम्मती व्यापारी एक छोटे से जलपोत में सवार हो कर हिंद महासागर में आ गया और उसका पहला पड़ाव चौल राज्य था। उसने इसी को हिंदुस्तान या भारत माना। निकीतीन ने केवल समुद्र तट से सटे दक्षिणी भारत की ही यात्रा की थी । उसके यात्रा विवरण में विजय नगर साम्राज्य, गुलबर्ग, बीदर, गोलकुंडा जैसे स्थानों का उल्लेख है, जो कि आज भी मशहूर हैं। निकीतीन की अवलोकन-दृष्टि भले ही कहीं-कहीं अतिशयोक्ति से परिपूर्ण लगती हो, लेकिन वह विभिन्न नगरों में मिलने वाले उत्पादों, धार्मिक अनुष्ठानों, जाति प्रथा पर टिप्पणी अवश्य करता है। विभिन्न राजाओं के वैभव, पराक्रम और शानो-शौकत पर भी उसने ढेर सारी जानकारी दी है। कुल मिला कर यह यात्रा-वृतांत मनोरंजक और सूचनाप्रद है।

Sample Page


Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy
Based on your browsing history
Loading... Please wait

Items Related to अफ़नासी निकीतीन की भारत... (Hindi | Books)

अरे यायावर रहेगा याद?: Essays by Ajneya (Travel Memoirs)
Deal 20% Off
Item Code: NZT167
$25.00$20.00
You save: $5.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
दिल से मैंने दुनिया देखी: I Saw The World With My Heart (Travel Memorial)
Deal 20% Off
by Harivansh
HARDCOVER (Edition: 2018)
RAJKAMAL PRAKASHAN PVT. LTD.
Item Code: NZS818
$22.00$17.60
You save: $4.40 (20%)
Add to Cart
Buy Now
उत्तर की यात्राएं : Travel North
by Suresh Salil
PAPERBACK (Edition: 2018)
Rajkamal Prakashan Pvt. Ltd.
Item Code: NZR026
$15.00
Add to Cart
Buy Now
अन्तर्यात्रा: Inner Travel
by Dr Gopinath Kaviraj
PAPERBACK (Edition: 2011)
Bharatiya Vidya Prakashan
Item Code: NZM847
$15.00
Add to Cart
Buy Now
Testimonials
My statues arrived today ….they are beautiful. Time has stopped in my home since I have unwrapped them!! I look forward to continuing our relationship and adding more beauty and divinity to my home.
Joseph, USA
I recently received a book I ordered from you that I could not find anywhere else. Thank you very much for being such a great resource and for your remarkably fast shipping/delivery.
Prof. Adam, USA
Thank you for your expertise in shipping as none of my Buddhas have been damaged and they are beautiful.
Roberta, Australia
Very organized & easy to find a product website! I have bought item here in the past & am very satisfied! Thank you!
Suzanne, USA
This is a very nicely-done website and shopping for my 'Ashtavakra Gita' (a Bangla one, no less) was easy. Thanks!
Shurjendu, USA
Thank you for making these rare & important books available in States, and for your numerous discounts & sales.
John, USA
Thank you for making these books available in the US.
Aditya, USA
Been a customer for years. Love the products. Always !!
Wayne, USA
My previous experience with Exotic India has been good.
Halemane, USA
Love your site- such fine quality!
Sargam, USA
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2020 © Exotic India